hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

उधार का सुख !

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भीड़ भरी सड़क पर धूल और पसीने से लथपथ एक रुमाल से पसीना पौछती, रोज सड़क से कभी कभी टूटी चप्पल घसीटती हुई घर तक पहुँचती थी। वही जिन्दगी चार दिन...
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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

मुझे मेरी उडान भरने दो

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ओ माँ मैं तुम्हारी जिंदगी नहीं जी सकती, मुझे मत सिखाओ ये दादी माँ की बंदिशें पुरातन रुढियों की दास्तानें, पंख फैला कर मुक्त आकाश में उन्मुक्...
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शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

अप्रियं सत्यम् न ब्रूयात !

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सच्चाई की कसौटी पर कसने के लिए जब अग्नि साक्षी मानकर खड़ी हुई, ऑंखें नम हुई, ओंठ थरथराने लगे क्या करने जा रही हूँ? औरों की नजर में ख़ुद को औ...
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गुरुवार, 20 अगस्त 2009

साहस तो करती माँ तुम!

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माँ मुझको बतलाओ क्यों मुझको सौपा तुमने इन हत्यारों को? दूर कहीं जाकर फेंका था मुझको निर्जन रास्तों या गलियारों में बोल नहीं सकती थी ...
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बुधवार, 22 जुलाई 2009

पाप के घड़े का छेद!

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अपने नन्हे हाथों से आँसूं पोछती हुई माँ के गालों से, अबोध सा मन बेचैन होकर करने लगा सवाल पर सवाल माँ-माँ मालकिन क्यों फेंककर मारी वो बर्तन ...
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शुक्रवार, 22 मई 2009

तिलक लगाने से कोई काबिल नहीं होता.

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मैं एक मीटिंग में थी और वहां का जो दृश्य था , एक मिनिस्ट्री स्तर की मीटिंग हो रही थी, उच्च पदों पर विराजमान लोगों की बात और तब मुझे लगा कि व...
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चुनाव - आंतरिक युद्ध

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महासमर जिसको कहते रहे सब, क्या वाकई एक आंतरिक युद्ध है ? वही तो है -- देश कहाँ है? कहाँ जा रहा है? क्या भविष्य होगा? इसकी किसको ख़बर है, बस...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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