जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
शुक्रवार, 25 सितंबर 2009
गुरुवार, 20 अगस्त 2009
बुधवार, 22 जुलाई 2009
शुक्रवार, 22 मई 2009