जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
सोमवार, 16 फ़रवरी 2009
सोमवार, 22 दिसंबर 2008
मंगलवार, 2 दिसंबर 2008
गुरुवार, 27 नवंबर 2008