hindigen

जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.

रविवार, 26 अक्टूबर 2008

एक ऐसा ही दीप जलाओ!

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परमार्थ में जीवन को ही मिटा दे, दीप सा दधिची दूसरा हुआ कहाँ? वह तो जलकर भस्म हुआ है, ...
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बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

आधार

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जीने के लिए एक ठोस धरातल चाहिए रेत के ढेर पर सजे जीवन के महलों को क्या कहा जा सकता है। रात के अंधेरे में न जाने कब और कहाँ ढह जाएँ अनजाने से...
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शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

शब्द!

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इन शब्दों ने सारे जहाँ को अपने से बाँध रखा है। रोते हुए अंतर को सहला कर कहीं वही मरहम बन- शीतलता का दे अहसास, शांत हो मन सब कुछ भूल आशा से न...
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सलाह

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मेरे एक कवि मित्र बोले, ये स्थापित कवि है इनकी संगति में रहें आप भी स्थापित हो जाएँगी मैं असमंजस में ये स्थापन किसका मेरा या कलम का हाथ जो...
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मंगलवार, 14 अक्टूबर 2008

बेचारी

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वह बेचारी आंसुओं के सैलाब्में उम्र भर डूबती-तिरती रही साँस मिलती रही जीने के लिए जरूरी थी। खोजती रही किनारा जहाँ सुस्ता ले जी भर रह-रह कर वह...
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अभिलाषा

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बहुत चाह की लिखना छोड़ दूँ, और आज से ही इस कलम को तोड़ दूँ, पर जब भी कोई भोगा हुआ यथार्थ कर गया अन्तर पर आघात आंसू की स्याही बन भावों के हस्त...
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लावारिस - बावारिस

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सुबह का अखबार जब हाथ में आया नजर पड़ी एक तस्वीर पर फिर उसका शीर्षक पढ़ा सड़क पर फ़ेंक दिया किसी सपूत ने अपने अपाहिज और मृतप्राय पिता को, उसने प...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
कानपुर , UP, India
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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