जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
बुधवार, 5 अगस्त 2026
नम आँखों के प्रश्न !
गुरुवार, 30 जुलाई 2026
अंतरीप !
रे मन तू अंतरीप बन जा
क्यों डूबा रहता है तू
अंहकार के घोर तिमिर में,
भटक न जाएँ कदम तुम्हारे
जीवन की इस कठिन डगर में ,
शांत, मूक औ' सजग दीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।
भौतिकता के तेज दौड़ का
अनुगामी न होना तू,
पाकर शक्ति धन या जन की
अभिमानी न होना तू,
मोती वाली एक मूक सीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।
सुख हो दुःख हो या हो धूप-छाँव
शीतलता हो या बढ़े उष्णता ,
ज्वार-भाटों के आवेगों में
रखना सदा बनाये दृढ़ता ,
संतापों से दूर सदा शांत द्वीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।
कितना ही सिर मारें लहरें
तूफानों का वेग प्रचंड सहो,
निश्चल, अटल, मध्य सागर के
खड़े सदा ही निर्संवेग रहो,
अंतर के भावों का भी तू महीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।
बुधवार, 15 जुलाई 2026
कुछ नया करें!
कुछ नया करें!
दर्द को हाशिये में डालो,
मुस्कानों के
सिलसिले से
एक इबारत नयी लिखो,
उनके बीच बस
बिंदियाँ दर्द की हों.
गर मुस्कानें कम लगें
खोज लो बचपन में,
निर्दोष, खामोश
जिंदगियों में और
उनको बाँट लो,
जग के सारे गम
उनके सामने
बहुत छोटे पड़ जायेंगे.
--रेखा श्रीवास्तव
शनिवार, 11 जुलाई 2026
गंगा का शाप!
गंगा का शाप!
मैं पावन हूँ,
मैं पावन हूँ,
गिरी धरा पर जब से मैं,
तब से सुना यही मैंने,
मैं गंगा, गोदावरी, यमुना,
कावेरी, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र
सब नाम हमारे पावन हैं।
निर्मल धाराएं मेरी
हो चुकी आज पंकिल हैं।
मेरे घाटों की पावनता,
धोते धोते पापों की गठरी,
मुझको पापिन सी लगती है।
बाँध मेरी धाराओं को
जहाँ तहाँ है मोड़ दिया,
कब तक सहती मैं यह मनमानी,
मेरे संयम को तोड़ दिया।
समेट लूँ अपनी धाराएँ ,
या बाँध लूँ सारी सीमायें,
फिर रेत किनारे कर लेना
मेरा तर्पण औ' मेरे जाने पर रो लेना।
क्षमा करो मैं जाती हूँ।
अपनी प्रगति के शिखर पर जाकर
तुम आकाश छुओ या चाँद रचो।
गंगा न अब शेष रही
मत क्रोधित कर रे मानव
फिर तोड़ मर्यादा शिव की भी ,
मैं सर्वनाश ही कर दूँगी ,
जब हाहाकार मचा होगा
धरा करेगी तांडव तब
डूबोगे उतराओगे तुम
कहीं ठिकाना न होगा।
बस शेष यही शाप होगा।
बस शेष यही शाप होगा।
बुधवार, 10 जून 2026
भावों का दरिया !
बंद आँखें
दिखती बंद भले ही हों,
मन की आँखें कब बंद हुई हैं ?
भावों का दरिया,
अंर्त में निर्बाध बहा है,
नहीं लिखा मसि से कागज़ पर,
अंकित होकर मन के पट पर,
हर कोना रंग चुका कभी का,
रोज भरती रही जगह पर,
फिर भी
शेष अभी हैं कुछ आँसू,
कुछ सदमे जो मन में छिपे हैं।
बाँट सके न जो दुःख अपना,
पीते रहे वो गरल समझ कर,
नीलकंठ बन जीवन भर,
सागर भर संताप पिया है।
समझो, एक अभिशाप जिया है।
- रेखा श्रीवास्तव
चाह आसमान की !
पाकर फल अपने श्रम का,
होकर पुलकित अंतर्मन से,
नज़रें जमाये हैं निज लक्ष्य पर ,
छूना चाह रहे आसमान।
देख रहे कंटकाकीर्ण धरा को ,
पर्वत खड़े है रोक कर राह ,
धरा से ही छलांग लगा कर,
छूना चाह रहे आसमान।
सपने हैं सागर से अनन्त ,
हौसलों से माप लेंगे एक पग में ,
पाँव रख कर हवाओं में,
छूना चाह रहे आसमान।
धारे आशीष अपने बड़ों का ,
पूरा करने उनके सपनों को,
पूरी ऊर्जा से चल पड़े हैं ,
छूना चाह रहे आसमान।
-- रेखा श्रीवास्तव
कानपुर
चाहत !
ये उम्र भी न
बदल देती है सब कुछ
कब
एक कोंपल को
पेड़ की शाखाओं का बना के हिस्सा
जीवन का बोझ बढ़ा देती है।
अपने ऊपर
बढ़ते हुए
बोझ को तो ढो लेता है
मजबूत शाखों के लिए
लेकिन
सब कुछ खो देता है।
और फिर
खुद जर्जर होकर
आश्रित हो जाता है उन पर।
वो दबंगई और आँख के इशारे पर
चलता था सब कुछ
आज शांत हो गया।
कभी सिर उठाती है वही आदत
तो जल्द ही
सिर ही झुका देती है।
उम्र लम्बी हो
तब माँ देती थी आशीष
अब
जब तक जिओ अपने दम पर
नहीं तो दूसरों की मर्जी पर
जीने से अच्छा है कि
वो नया जन्म ले और फिर कोंपल बने।
-- ©रेखा श्रीवास्तव
सोमवार, 8 जून 2026
बोनसाई का असर!
बोनसाई संस्कृति
हर जगह जरूरत बन गई है
भूल गए हैं कि,
बोनसाई सिर्फ सर्वस्व नहीं,
हमारे विकल्प होते हैं।
वृक्ष जब तक जड़ों से जुड़े है,
तो चारों ओर फैलते हैं,
और भी अधिक गहराई में
अपना विस्तार करते है,
बाँध कर रखना चाहते हैं
सदियों तक
अपनी अस्तित्व को धरा से,
वंश फलता फूलता रहे।
अब नये रूप को स्थापित कर,
अपनी ही शाखायें और जड़ें
काट दी जाती है ।
आज बेतरतीबी किसी को पसंद नहीं,
प्रकृति सबको
एक साथ रूप तो नहीं देती।
तभी तराश देते हैं या
खुद कट जाते हैं।
ठीक एक पके फल की तरह
कीमत जो बढ़ जाती है।
अब तक पिता के लिए था -
दो बेटे और एक बेटी एक परिवार।
अपने पिता को कर दरकिनार,
बेटों के घर बसते ही,
तीसरे चरण के बढ़ते ही,
विभिन्न प्रकार के बनाए गए तरीकों से,
बस एक को उखाड़कर
नीचे से तराश दिया।
बाप, चाचा, बुआ, मामा और मौसी तक
अब आवाजें दी नहीं जातीं,
तराश दिया
क्योंकि फैलने के लिए तो विस्तार नहीं
परिसीमन ही होगा न,
अब आगे की शुरुआत है,
इतनों को ढोते ढोते वह दब गये,
अब पीपल या वटवृक्ष नहीं,
छोटे और तराशे गये
बेनबाई बहुत ही खूबसूरत दिखते है,
परिवार भी अब दो या तीन से सजते हैं।
हां बोनसाई परिवार
ऊपर और नीचे से तराश कर
इच्छानुसार बांध कर
नया स्वरूप बन रहा है,
बोनसाई पर अभी शोध चल रहा है।
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026
एक नदिया सी !
एक नदिया सी !
हाँ मैं जिंदगी हूँ,
किसी की भी होऊं,
एक अनचाही इबारत
जिसे लिखा किसी और ने है,
और कहलाई वो मेरी है।
लिखना मैंने भी चाहा
लेकिन
खुद को निर्वस्त्र करने जैसा लगा,
कुछ अपराधबोध भी हुआ,
प्रबुद्ध, विचारशील फिर भी
क्यों जीती रही ?
औरों के लिए उनके इशारे पर
हाँ एक कठपुतली सी है ये जिंदगी ,
कोई नचाता रहा और नाचती मैं रही ,
किसने कहा कि ये मेरी है?
थोपी हुई है मुझ पर ,
इसमें तो साँसे भी अपनी नहीं होती,
जिसकी मर्जी पर चल रहीं है,
वही तो रचयिता है।
मैं तो एक नदिया सी बह रही हूँ,
जाकर सागर में मिल जाना है।
टाइम कैप्सूल
टाइम कैप्सूल
अक्सर उठाती हूँ कलम
लिख देती हूँ कोई इबारत पन्नों पर
कुछ पलों में,
गर रख दी कलम कभी
बदल जाती है मन में इबारतें
औ'
फिर काट दिया पन्ने पर लिखा हुआ।
बंद डायरी रखी रही कई कई दिन,
फिर उठाया और देखा
अरे ये मैंने ही लिखा था ,
फिर छोड़ क्यों दिया अधूरा ?
शायद वक़्त के साथ
सोच, पहुँच और तजुर्बा
हर रोज कुछ नया सिखा जाता है।
बेमानी सा होने लगता है ,
वह सब जो देख आये हैं ,
बदल रही हैं परिभाषाएं भी -
रिश्तों, जिन्दगी और प्रेम की तहजीब में,
कुछ नया स्वीकारने की
शायद उम्र नहीं रही
क्योंकि
पुराने ख़्याल अब पत्थर बन चुके हैं।
कागज़ नहीं कि लिखा और फाड़ दूँ,
गुजारे हुए उस वक़्त को
एक काल-पत्र (टाइम कैप्सूल) में
इतिहास बना कर धरती में गाड़ दूँ।
गुरुवार, 19 मार्च 2026
दो शब्द!
दो शब्द !
अक्सर देखती हूं कि सोशल मीडिया पर कुछ मित्रों की शिकायत होती है कि लोग सुप्रभात, शुभ रात्रि भेजते रहते हैं और हमें इस बात से बहुत ही चिढ़ होती है। अगर इसे भेजने की जरूरत को समझा जाय तो इस जीवन की आपाधापी में हम न तो अपने बहुत करीबियों से रोज कॉल कर पाते हैं और न हीं रूबरू मिल पाते हैं। एक शहर में रहकर भी हम अपने मित्रों से भले ही न मिल पाये, न हीं बात कर पाए, यह दो शब्द हमें एक कुशलता का समाचार देने के लिए पर्याप्त होते हैं। रोज न सही कम से कम सप्ताह में एक और दो बार संदेश हम देते हैं, पाते हैं तो एक संतोष होता है कि सब कुशल है। कुछ अधिक गैप होने पर हमें खटकने लगता है कि क्या बात है उत्तर नहीं मिल रहा है या कॉल करने ही पूछ लिया जाए।
यह आवश्यक है कि एक नज़र उनके संदेशों पर डाल दी जाए। मेरी एक कजिन हम सबसे जुड़ी थी, हर रिश्ते को निभा रही थी। भले ही इन शहर में ही प्रमुख अवसरों पर मुलाकात होती हो और मैसेंजर पर संदेश भी भेजती थी।
एक करीब एक महीने कुछ समारोहों के चलते, कुछ स्वास्थ्य के चलते मैं मैसेंजर पर नहीं जा पाई। जब घर वापस आई तो सूचना मिली कि इंदु नहीं रही। एकदम से आघात लगा बरसों से सब ठीक चल रहा था, बरसों से हम जुड़े थे और यह जुड़ाव एक अकेले को भी एक संबल देता है। वह अकेली सबको मैसेज भेज कर और पढ़कर अपने अकेलेपन का एक साथी पाती थी।
अपनों से जुड़े रहिए उम्र की एक पड़ाव पर सबके रहते हुए भी इंसान अकेला होता है, तो फिर साथ बने रहिए न, अगर मैं आपको पसंद न हो तो शालीनता से मना कर दीजिए, लेकिन उपहास बिल्कुल भी मत कीजिए। आपकी उपेक्षा से बेहतर यही है कि अगर अगला समझदार हैं तो उपेक्षा मिलने पर समझ जाता है और स्वयं बंद कर देगा। यह सोचकर कि आप संबंध रखना पसंद नहीं करते या जुड़े रहना नहीं चाहते हैं तो आपको स्पष्ट कह देना बहुत अच्छा होगा, लेकिन जिनके लिए यह एक सहारा होता है या जिनके लिए ही एक समाचार पाने का साधन होता है उनके लिए एक सुप्रभात या एक शुभ रात्रि बहुत मायने रखती है इस बात को सोचिएगा।
सोमवार, 23 फ़रवरी 2026
किसी के लिए!
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026
दोहे!
दोहे !
1. बदरी छाई जगत में, विपदा की चहुँ ओर ।