बुधवार, 10 जून 2026

भावों का दरिया !

बंद आँखें 

दिखती बंद भले ही हों,

मन की आँखें कब बंद हुई हैं ?

भावों का दरिया, 

अंर्त में निर्बाध बहा है, 

नहीं लिखा मसि से कागज़ पर, 

अंकित होकर मन के पट पर,

हर कोना रंग चुका कभी का, 

रोज भरती रही जगह पर,

फिर भी 

शेष अभी हैं कुछ आँसू, 

कुछ सदमे जो मन में छिपे हैं। 

बाँट सके न जो दुःख अपना,

पीते रहे वो गरल समझ कर,

नीलकंठ बन जीवन भर,

सागर भर संताप पिया है।

समझो, एक अभिशाप  जिया है। 


- रेखा श्रीवास्तव 

चाह आसमान की !

 

पाकर फल अपने श्रम का, 

होकर पुलकित अंतर्मन से,

नज़रें जमाये हैं निज लक्ष्य पर , 

छूना चाह रहे आसमान।


देख रहे कंटकाकीर्ण धरा को , 

पर्वत खड़े है रोक कर राह , 

धरा से ही छलांग लगा कर,

छूना चाह रहे आसमान।


सपने हैं सागर से अनन्त  ,

हौसलों से माप लेंगे  एक पग में ,

पाँव रख कर हवाओं में,

छूना चाह रहे आसमान। 


धारे आशीष अपने बड़ों का ,

पूरा करने उनके सपनों को,  

पूरी ऊर्जा से चल पड़े हैं ,

छूना चाह  रहे आसमान।  


-- रेखा श्रीवास्तव

कानपुर



चाहत !

 ये उम्र भी न 

बदल देती है सब कुछ 

कब

एक कोंपल को 

पेड़ की शाखाओं का बना के हिस्सा

जीवन का बोझ बढ़ा देती है। 

अपने ऊपर 

बढ़ते हुए 

बोझ को तो ढो लेता है 

मजबूत शाखों के लिए 

लेकिन 

सब कुछ खो देता है। 

और फिर 

खुद जर्जर होकर 

आश्रित हो जाता है उन पर।

वो दबंगई और आँख के इशारे पर 

चलता था सब कुछ 

आज शांत हो गया। 

कभी सिर उठाती है वही आदत 

तो जल्द ही  

सिर ही झुका देती है। 

उम्र लम्बी हो

तब माँ देती थी आशीष 

अब 

जब तक जिओ अपने दम पर 

नहीं तो दूसरों की मर्जी पर 

जीने से अच्छा है कि 

वो नया जन्म ले और फिर कोंपल बने। 

-- ©रेखा श्रीवास्तव 

सोमवार, 8 जून 2026

बोनसाई का असर!

 बोनसाई संस्कृति 

हर जगह जरूरत बन गई है

भूल गए हैं कि,

बोनसाई सिर्फ सर्वस्व नहीं,

हमारे विकल्प होते हैं।

वृक्ष जब तक जड़ों से जुड़े है,

तो चारों ओर फैलते हैं,

और भी अधिक गहराई में

अपना विस्तार करते है, 

बाँध कर रखना चाहते हैं

सदियों तक

अपनी अस्तित्व को धरा से,

वंश फलता फूलता रहे।

अब नये रूप को स्थापित कर,

अपनी ही शाखायें और जड़ें 

काट दी जाती है ।

आज बेतरतीबी किसी को पसंद नहीं,

प्रकृति सबको 

एक साथ रूप तो नहीं देती।

तभी तराश देते हैं या

खुद कट जाते हैं।

ठीक एक पके फल की तरह 

कीमत जो बढ़ जाती है।

अब तक पिता के लिए था -

दो बेटे और एक बेटी एक परिवार।

अपने पिता को कर दरकिनार,

बेटों के घर बसते ही,

तीसरे चरण के बढ़ते ही,

विभिन्न प्रकार के बनाए गए तरीकों से,

बस एक को उखाड़कर

नीचे से तराश दिया।

बाप, चाचा, बुआ, मामा और मौसी तक 

अब आवाजें दी नहीं जातीं,

तराश दिया 

क्योंकि फैलने के लिए तो विस्तार नहीं 

परिसीमन ही होगा न,

अब आगे की शुरुआत है,

इतनों को ढोते ढोते वह दब गये,

अब पीपल या वटवृक्ष नहीं,

छोटे और तराशे गये 

बेनबाई बहुत ही खूबसूरत दिखते है,

परिवार भी अब दो या तीन से सजते हैं।

हां बोनसाई परिवार 

ऊपर और नीचे से तराश कर

इच्छानुसार बांध कर

नया स्वरूप बन रहा है,

बोनसाई पर अभी शोध चल रहा है।