टाइम कैप्सूल
अक्सर उठाती हूँ कलम
लिख देती हूँ कोई इबारत पन्नों पर
कुछ पलों में,
गर रख दी कलम कभी
बदल जाती है मन में इबारतें
औ'
फिर काट दिया पन्ने पर लिखा हुआ।
बंद डायरी रखी रही कई कई दिन,
फिर उठाया और देखा
अरे ये मैंने ही लिखा था ,
फिर छोड़ क्यों दिया अधूरा ?
शायद वक़्त के साथ
सोच, पहुँच और तजुर्बा
हर रोज कुछ नया सिखा जाता है।
बेमानी सा होने लगता है ,
वह सब जो देख आये हैं ,
बदल रही हैं परिभाषाएं भी -
रिश्तों, जिन्दगी और प्रेम की तहजीब में,
कुछ नया स्वीकारने की
शायद उम्र नहीं रही
क्योंकि
पुराने ख़्याल अब पत्थर बन चुके हैं।
कागज़ नहीं कि लिखा और फाड़ दूँ,
गुजारे हुए उस वक़्त को
एक काल-पत्र (टाइम कैप्सूल) में
इतिहास बना कर धरती में गाड़ दूँ।
आपने शब्द नहीं लिखे, आपने अपने बदलते हुए मन को पकड़ लिया। मुझे सबसे ज़्यादा वो एहसास लगा जब आप खुद ही अपने लिखे को काट देती हो, क्योंकि वही असली जंग होती है, खुद से। पोस्ट में आपने समय को बहुत खूबसूरती से दिखाया, जैसे वो हर दिन हमें नया बनाता है और पुराने हिस्सों को चुपचाप पीछे छोड़ देता है।
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