मंगलवार, 29 मई 2018

आज भी !

अरे वनिता
तुम आज भी
सुन रही अपशब्द,
सह रही हो
अपने जनक - जननी के लिए
सदियों से चले आ रहे
वही जुबान पर बसे  विशेषण।
अपना सर्वश्रेष्ठ देकर  भी
सुनती हो हर उस इंसान के कटाक्ष ,
जो ससुराल नाम के तीर्थ में पैदा हुआ है।
हाँ,
इनसे बड़ा तोहफा भी तो है ,
कभी पति की  गालियां और कभी मार ,
कभी सोचा है किसने दिया
उसे ये अधिकार ,
तुम बहुत चतुर हो
छिपा लेती हो बच्चों से ,
सहकर्मियों से ,
बना कर बहाना।
उस दिन तुम टूट जाओगी
जब बेटी कहेगी -
माँ कल फिर वही हुआ
सोती नहीं हूँ में ,
कान में  अंगुली डाल कर पड़ी रहती हूँ.
कब तक तुम सहोगी ?
कमाओगी , पकाकर खिलाओगी और
खुद मार और गालियां खाओगी।
दुर्गा और काली बन कर संहार करो ,
उनके उस दम्भ और अहंकार का
जो पुरुष होने पर पाल रखा है।
जो हाथ उठे उसे तोड़ दो ,
जो आँख उठे उसे फोड़ दो।
तुम सृष्टि हो
अपूर्ण हो तो पूर्ण वह भी नहीं।
जिस दिन वो मुखौटा लगाना छोड़ दे,
सृष्टि का सम्मान करना सीख ले,
लौटा देना वह स्थान
सुबह के भूले को माफ करना
 तुम्हें ही तो आता है ,
लेकिन अब अपने आत्मसम्मान की कीमत पर कभी नहीं।