बुधवार, 22 अप्रैल 2015

विश्व पृथ्वी दिवस !

मैं धरती
मैं पृथ्वी
मैं धरा कही जाती हूँ।
मैं जीवन
मैं घर द्वार
मैं सरिता ,जंगल -वन , पर्वत,
सदियों से धारे हूँ।
सदियों से
सब जीव मुझसे जीवन लेकर
जीते , फलते और फूलते आ रहे हैं,
मेरी संतति कहे जाते हैं।
जब तक माँ समझा मुझको
मान और सम्मान दिया ,
मैं मान संतति तुम सबको
पाल रही थी,
पाल रही हूँ।
फिर बदल दस्तूर जहाँ का
संतति हुई  माँ से बढ़ कर
मैं बेचारी मौन हो गयी।
हरीतिमा मेरी
जो था मेरा पहला श्रृंगार
सबसे पहले लिया उतार।
पाट दिए तुमने
कुएँ , जलाशय , झील ,बावड़ी
बांध दिया सरिता की गति को ,
सूखी धरती कितना जिएगी ?
वायु प्रदूषण ,
जल प्रदूषण ,
ध्वनि प्रदूषण
इतने तो उपहार दिए।
मेरे ऊपर लाद दिया है तुमने
बोझ मेरे तन से ज्यादा ,
सिसक रही हूँ ,
कराह रही हूँ ,
तुम बधिरों से चुप हो  लगाये।
गर क्रोध भरी माँ ,
बेटों को ताड़ना दे ,
सुधर जाओ ,
लेकिन तुम मानव 
ईश्वर बन रहे हो। 
अब शर्म आती है ,
अपनी संतान कहते ,
मेरे क्रोध से 
तुम भयभीत नहीं। 
नहीं चाहती अपनी ही संतति को 
फिर अपने गर्भ में समां लूँ। 
अब मजबूर हूँ ,
सहन नहीं होता 
बोझ तुम्हारे प्रगति का। 
अब भी सजग न हुए तो 
सिर्फ तुम रहोगे ,
मैं नहीं ,
लेकिन तुम रहोगे कहाँ ?
गर समझ सको तो 
समझो अब भी 
माँ के बिना जीवन 
जी न सकोगे ,
गर दूसरी धरा का निर्माण 
कर सको तो 
करके जी लेना।

























बुधवार, 15 अप्रैल 2015

प्रेम !

प्रेम 
वह पवित्र भाव ,
जिसमें सिर्फ और सिर्फ 
निर्मल, निश्छल और निष्पाप 
आत्मा का समावेश है,
कहीं कोई 
तृष्णा , चाह या स्वार्थ नहीं,
आत्मा से आत्मा का 
मिलन ही प्रेम है। 
ये जरूरी तो नहीं 
कि रुक्मणी का प्रेम 
राधा सा प्रेम हो ,
गोपियों का प्रेम 
सत्यभामा सा अधिकार चाहे। 
तभी तो राधा 
सदैव कृष्ण के नाम से जुडी 
पहले राधा फिर कृष्ण 
राधाकृष्ण , राधारमण 
राधेश्याम 
यही सम्बोधन कृष्ण के प्रतीक 
किस लिए बने ?
प्रेम के आत्मा से जुड़े 
रिश्तों का प्रतीक रूप 
ये प्रेम कभी सम्पूर्ण न हुआ हो ,
जुड़े तो लेकिन 
इस दुनियाँ की नजर में 
मीरा का प्रेम,
राधा का प्रेम ,
सिर्फ पूजने के लिए है। 
प्रेम पूजा ही तो है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

नदी का जीवन सन्देश !


 




सरिता तीरे
धीरे धीरे
मंद प्रवाहित
सुखद समीरे ,
लहरें थामें अपनाआँचल
साक्षी हैं
ये लहरें औ' जल।
जीवन क्रम भी
उदित सूर्य
तप्त सूर्य
या फिर
शांत रक्तवर्ण सूर्य से
जुड़ा जो रहता है।
ये सरिता
अपने जल में
जीवन के हर आश्रम को
चाहे वो
ब्रह्मचर्य , गृहस्थ ,वानप्रस्थ और संन्यास हों
हर एक को
एक दिन के सूर्योदय से
सूर्यास्त तक जी लेती  हैं।
रोज जीती है
पर कभी क्षरित नहीं होती.
मानव जीवन की
समरस , समतल , सम्प्रवाह लिए
देती है एक सन्देश
सब कुछ समाहित करो,
अपने अंतर में
 सत्य - असत्य ,
क्षम्य - अक्षम्य,
और पाप और पुण्य भी।