बुधवार, 30 जनवरी 2013

सोच बदलें !

हम इंसान है,
हम सृष्टि के 
बुद्धिमान प्राणी हैं,
बुद्धि, विवेक , दया , ममता 
सिर्फ इंसान में 
प्रकृति ने दी थी .
फिर क्या हुआ ?
इंसान में से 
एक एक करके 
किसी में कुछ 
किसी में कुछ 
ये गुण साथ छोड़ने लगे ,
फिर आज वह 
पशु से भी नीचे 
गिर गया 
वह अपने कर्मों से 
अपनी सोच से 
अपनी दृष्टि में 
हैवान से भी बड़ा हो गया .
अब कौन सा परिवर्तन 
कौन सा कदम 
उन्हें वापस इंसान 
बनाने के लिए 
उठाना होगा . 
ये तो तय है अब 
ये काम अब इश्वर नहीं 
बल्कि हमको करना होगा .
वो जो हम भूल गए 
अपने में खो कर 
कुछ कहीं भूल गए 
अब बचपन जब 
माँ के  आँचल में नहीं ,
नानी और दादी की गोद  में नहीं 
रिमोट, कंप्यूटर , वीडिओ गेम में आँख खोलेंगे 
तो फिर संस्कार भी तो 
उनसे ही मिलेंगे न। 
अब हम जागें 
फिर से 
अपनी दादी नानी की तरह 
नयी पौध के अबोध मन को 
कच्ची मिटटी की तरह 
एक सांचे में ढालना होगा 
तभी तो फिर से 
हम संस्कारों से उनको 
सुसंस्कारित कर  
मानवता के रिश्तों के 
नए अर्थ समझा पायेंगे 
उन्हें फिर नारी में 
माँ, बहन और बेटी के 
रूपों को दिखा पायेंगे। 
आदर , स्नेह, निष्ठां के 
सही अर्थों को सिखा पायेंगे .



शनिवार, 19 जनवरी 2013

आजाद ही रहेंगे !

हम आसमान की 
ऊँचाइयाँ छू रहे हैं,
देखा नहीं जाता 
फिर बंदिशों के ताले में 
कैद करने की 
साजिशें रच रहे हो .
ये बंदिशें सिर्फ  
हम पर ही क्यों लगें?
कभी अपने पर 
अंकुश लगाने की सोची ?
नहीं 
आखिर क्यों नहीं?
इतिहास की तरफ 
अंगुली उठा रहे हो 
चाहते हो 
फिर से कैद करके
हमें महफूज़ तुम रखोगे 
महफूज़ हो तुम कहकर 
सेहरा अपने सिर 
बाँधना चाहते हो।
इन बेड़ियों में रहकर 
सितम जो हमने सहे हैं 
उनको अभी भूले नहीं है .
महफूज़ के नाम पर 
गुलामी हमने की है 
दो रोटियों और धोतियों की खातिर 
पूरी जिन्दगी हमने दी है।
चिराग भी दिया है 
खानदान को तुम्हारे 
तुमने क्या दिया था ? 
आजाद हो चुके हैं 
आजाद ही रहेंगे .

 बगावत जो हमने की है 
वो जारी अभी रहेगी।
आजाद ही रहेंगे
महफूज़ भी रहेंगे।
तुम न रख सके 
तो हम दुर्गा बन रहेंगे 
सीता बन जी चुके बहुत 
अब दुर्गा बन जियेंगे 
अब काली बन जियेंगे।  

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

हाइकू !

क़ानून तेरा 
मुझे क्या न्याय देगा ?
खुद करूगी।
*******'
चेहरे ढके 
क्या गुनाह छिपेगा ?
धिक्कारते हैं।
*******
मशालें जलीं 
ज्वालामुखी न बनें 
हदें जान लो।
*******
कैद कर दो,
सिफारिशे हो रही 
हदें जान लो। 
*******
हमारे लिए 
इतिहास की बात 
खुद खुदा हैं। 
********
उड़ाते हैं वे 
कीचड हम पर 
सने खुद हैं।
********
वे चाहते है  
हम भटक जाए 
इस जंग से .
*******
इस जंग में 
हौसले से लड़ना 
जीत हमारी।
********


मंगलवार, 8 जनवरी 2013

रक्तबीज और महाकाली !



मैं  "दामिनी "
तुम्हें चुनौती देती हूँ ,
मैंने अपना बलिदान दिया
या फिर तुमने
मुझे मौत के हवाले किया हो ,
तब भी मैं
अब हर उस दिल में
जिन्दा रहूंगी,
एक आग बनकर ,
जब तक कि 
इन नराधम , अमानुषों को
उनके हश्र तक न पहुंचा दूं।
सिर्फ वही क्यों?
उस दिन के बाद से
मेरी बलि के बाद भी
अब तक उन जैसे
सैकड़ों दुहरा रहे हैं इतिहास ,
वो इतिहास जो
मेरे साथ गुजरा था
रोज दो चार मुझ जैसी
मौत के मुंह में जाकर
या फिर
मौत सी यंत्रणा में
जीने को मजबूर हैं।
वे तो अभी दण्ड के लिए
एकमत भी नहीं है ,
और हो भी नहीं पायेंगे .
क्यों?
इसलिए की उनके अन्दर भी
वही पुरुष जी रहा है,
क्या पता
कल वही अपने अन्दर के
नराधम से हार जाएँ ?
और वह भी
कटघरे में खड़े होकर
उस दण्ड के भागीदार न हों।
अभी महीनों वे
ऐसे अवरोधों के चलते
और ताकतवर होते रहेंगे।
अब मैं नहीं तो क्या ?
हर लड़की इस धरती पर
महाकाली बनकर जन्म लेगी
और इन रक्तबीजों के
लहू से खप्पर भरकर
बता देंगी कि
अब वे द्रोपदी बनकर
कृष्ण को नहीं पुकारेंगी।
खुद महाकाली बनकर
सर्वनाश करेंगी।
इन रक्तबीजों के मुंडों की माला
पहन कर जब निकलेगी
तो ये नराधम
थर-थर कांपते हुए
सामने न आयेंगे .
हमें किसी दण्ड या न्याय की
दरकार होगी ही नहीं,
वे सक्षम होंगी
और समर्थ होंगी।
ये साबित कर देंगी।
ये साबित कर देंगी।

सोमवार, 7 जनवरी 2013

सर्द इरादों से आगे !

सर्द दिन और सर्द रातों में
हौंसले सर्द नहीं  दिखते हैं ,
हम अड़े है उनके अंजाम पर
जो आज भी सर्द रातों में भी
 कांपते नहीं है गुनाह करने से.
हम भी अपने इरादों को अब
कमजोर कभी नहीं  पड़ने देंगे
उन्हें उनके गुनाहों की सजा
मुक़र्रर करवा कर ही दम लेंगे .
उनके आका गर ढल बन कर
खड़े हों तो क्या हमारी तलवारें
भय से अब टूटने वाली नहीं है।
उन जैसों का जुर्म सिर्फ एक सजा
मौत ही क्यों न हो नहीं मिटा  सकती  है ,
उन्हें सजा देने  के लिए क्या सोचें ?
तिल तिल मरने की सजा भी कम है।
 न  जाने कितनी "दामिनी " आज भी
तिल तिल मर कर जी रही हैं।
उन सबके गुनाहगार हाजिर हों
चाहे वे कोई भी क्यों न हो?
दंड तो उन्हें एक ही मिलेगा अब
वह न्याय अब उनकी  मर्जी से नहीं
हमारी मर्जी से  ही निर्णीत होगा .

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

आगत का हो स्वागत !

आगत का हो  स्वागत , विगत की करें हम  विदाई ,
शांति के पुजारी हम खड़े हैं करने को न्याय की लड़ाई .

रास्ते अपनी जिन्दगी का , हम सब कर रहे है तलाश 
इंसान में इंसान के प्रति , कुछ तो शेष रहें  अहसास .

नहीं पता हमको , न्याय की ये जंग कहाँ  तक जायेगी ?
दिलों में लगी ये आग, कब तक जलेगी या बुझ जायेगी।

शक्ति है हमारी आवाज में औ'  बुलंद ही रखें साथ में ,
 मशाल भी अब तो  न्याय पाने तक रहेगी हर हाथ में।

चाहे वो हम टूट जाएँ किसी की सांस की तरह थक कर ,
समझे नहीं वो जज्बे को , सांस भी न लेंगे हम रुक कर .

न्याय चाहिए बदले केलिए नहीं हम लिए मशाल खड़े हैं ,
अब  और आगे भी न हो कोई दिन ऐसा इस पर  अड़े हैं।