रविवार, 29 अप्रैल 2012

आज और कल !

अब कदम भी
साथ चलने को तैयार नहीं.
वह तो अब भी
वही चाहते हैं,    
जिसे सदियों से 
देखते चले आ रहे हैं. 
आधुनिक युग ने 
तमक कर कहा -
ऐसी कौन सी धरोहर है?
जिसे देख कर 
हमें धिक्कार रहे हो.
अरे कुएं से निकल कर
बाहर आओ.
देखो तो सही
इस दुनियां में 
कितने चमत्कार है?
वो खेतों की मेंड,
और खेतों में बने
मचान कर रहने के सदमें से
बाहर निकलना सीखो.
ये ऊँची ऊँची अट्टालिकाएं 
उजाले से दमकते हुए शहर
अब लोग खेत नहीं
फलित चाहते हैं.
देखो कब तक   
तुम 
इन्द्र देव की और हाथ उठा कर 
प्यासी आखें लिए
तरसते रहोगे.
बाहर निकालो इस व्यामोह से,
खुद भी जिओ और हमें भी जीने दो.
बेचो खेत 
और करोड़पति बन जाओ.
पीढियां बैठ कर खायेंगी.
वो तो सच है कि 
खेत में वर्ष भर हल जोत कर
पानी देकर भी 
फसल को हम अपनी तो
नहीं कह सकते हैं.
पता नहीं कौन सा पल 
सब बर्बाद कर दे और
फिर   खाली हाथ 
लेकिन  इसे बेचकर भी
क्या हम 
उन करोड़ों से फसल उगा कर 
खा सकेंगे?
हम रुपये तो नहीं खायेंगे.
एक फसल गयी तो
दूसरी की आशा जीवित रहती है.
अगर अपनी इस माँ को बेच दिया तो
फिर वो माँ कहाँ से पायोगे? 
अभी ये गाँव है,
इसमें कुछ आम के बगीचे भी,
चौपाल और निबरिया भी है
हम इसके आदी हैं
इसमें में जिए है
फिर ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं  में
अगर बगीचे लगाने का वादा करो.
हमारी चौपाल और निबरिया को ले चलने का वादा करो 
तो हम
तुम्हें करोडपति बना कर
जीने का हक देते हैं.
खुद की सारी  जिम्मेदारी तुम्हें देते हैं.
बस वादा पूरा कर देना.
इस दुनियां तो उजाड़ने से पहले
हमारी दुनियां वही पर बसा देना. 
  
    
      
                 

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

बाती का दर्द !

दीप जलाया
रोशनी फैलेगी तो
बाती रो पड़ी
पूछा बाती से
रोई तू क्यों ऐसे
स्त्रीलिंग हूँ न
क्या पता कौन सा
विपरीत लिंग मुझे बुझा दे.
पर तेरे बिना तो
दीप कुछ भी नहीं,
उससे क्या
जब सारी बातियाँ बुझ जायेंगी
धरा घिर जाएगी अँधेरे में
फिर लकड़ियों
अरे ये भी स्त्रीलिंग
फिर आग
मैं फिर भूली
ये आग भी तो वही है.
फिर क्या होगा?
कुछ भी नहीं
ये पुर्लिंग
की आखिरी खेप
फिर धरा पर
कोई सृष्टि न होगी,
क्योंकि गर्भ ही न होगा
तो कौन गर्भवती और कैसा प्रजनन ?
इसलिए
अब तैयार रहो
अपने ही किये की
सजा पाने को.
हर वो स्त्रीलिंग
जो ख़त्म कर रहे हो.
यही शाप दे रही है
तुम भविष्य में संतति के लिए तरसो.

हाईकू !

कभी कुछ मन नहीं करता है और कलम उतावली होती है पेज रंगने को क्योंकि उसमें तो भाव भरे होते हें फिर ऐसे ही रच जाती है कुछ हाईकूपहली बार लिखा है सो क्षमा याचना के साथ


ईमान बेचा
खरीदार तो होगा
पाक साफ है.
* * *
अपने छूटे
सारे भ्रम ही टूटे
अकेले अब .
***
दर्द छलका
आँखें बोल रही थी
खामोश जुबां.
***
दुर्जन कौन
सफेद कपड़ों में
काले मन का.
***
धरा उदास
आसमान से झाँका
सुनसान था
***
दीप जलाया
रोशनी फैलेगी तो
बाती रो पड़ी
***

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

दीवार कब कैसी?

दीवार
शब्द वही
बस स्वरूप में
उसके अर्थ बदल जाते हें।
दीवार जब
बन जाती है
किसी छत का सहारा ,
तो
कितनी जिन्दगी उसके नीचे पलती हैं।
वो घर का एक अंश बन जाती है।
लेकिन जब ये दीवार
किसी आँगन के बीच खड़ी होती है,
बाँट देती है --
किसी घर के लोगों को
और दो घर बना देती है।
अगर यही दीवार
खिंच जाती है
अनदेखी से स्वरूप में
वह दिलों में
अपनी जगह बना लेती है ,
तो फिर
क्या सहोदर,
क्या सहोदरा,
माँ -बाप और बेटे
तक के
रिश्ते में आकर
एक अनदेखा बंटवारा कर जाती है
कि फिर ये कभी गिरती ही नहीं है।
दो इंसान
एक घर में सही
इस दीवार के रहते
हंसते भी है,
एक दूसरे के सामने होते भी है
लेकिन
वो खून के रिश्ते को
चला नहीं रहे होते
बस ढो रहे होते हें।
ईंट गारे की दीवार तो
फिर भी गिर सकती है
पर ये दीवार
कभी गिरती नहीं है।
वक्त इसको और मजबूत कर जाता है।
ये दीवार की कहानी है।
तेरी और मेरी जुबानी है।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

हाँ मैं गुनाहगार हूँ !

मुझ पर इल्जाम है
कि मैंने अपना ईमान बेचा है,
मैं स्वीकारता हूँ
ये सच है.
लेकिन कभी किसी ने
मेरे चारों ओर खड़े
उन खरीदारों की ओर देखा है,
जो मोटे मोटे थैले लिए खड़े हें
क्या वे गुनाहगार नहीं?
जब खरीदार नहीं होगा,
तो कौन बिकेगा और कौन बेचेगा?
कब तक बच कर रहता?
क्या माँ बाप को
दम तोड़ते देखता रहता ?
दवा के पर्चों पर
अपनी बेबसी की मुहर लगा कर
कूड़े में फ़ेंक देता
या फिर
उन्हें मरते हुए देखता
या फिर किसी वृद्धाश्रम में
डाल कर हाथ धो लेता
बच्चों के पेट भरने को
पत्नी के तन ढकने को
कहाँ से लाता पैसे?
मिलता तो कम
देने वाले ही छीन लेते हें
कहाँ तक खुद को बेचता?
ईमान बेच कर
माँ बाप को तो बचा लिया,
बच्चों को तो पढ़ा लिया
जब सारी दुनियाँ बेईमान है,
कर रही है कुकृत्य
बटोर रही है तालियाँ और वाहवाही
मैंने किसी की हत्या तो नहीं की?
मैंने किसी का घर तो नहीं उजाडा?
किसी दिए की रोशनी तो नहीं छीनी?
फिर मैं गुनाहगार क्यों?
मेरे पास इमारतें नहीं ,
मेरे पास गाड़ियाँ नहीं,
पत्नी के पास जेवरों का ढेर भी नहीं,
बच्चों ने किराये की साइकिल लेकर
स्कूल जाना सीखा है
फिर भी
गुनाहगार हूँ मैं
अदालत का तलबगार हूँ
मैं,
क्योंकि गरीब का ईमान
चर्चा का विषय होता है
जो सरेआम बेच रहे हें,
इस देश को
उनकी ओर अंगुली उठाकर तो देखो
अंगुली ही नहीं
पूरा हाथ ही नहीं रहेगा
जबान खोलकर तो देखो
खामोश कर दिए जाओगे
क्योंकि
उनका ईमान मंहगा है
उनकी इज्जत पर भारी है
कीमत तो बस कम
इस दुनियाँ में हमारी है
और
इसी जगह
मैं और मेरी आत्मा हारी है