शनिवार, 29 मई 2010

ये हादसों की इमारत !

ये जिन्दगी
हादसों की इमारत है,
जिसकी एक एक ईंट के  तले दबे
इस जिन्दगी के
कुछ न भूलने वाले 
हादसे ही तो हैं.
इसको आकार देने में
कभी मन से
कभी बेमन से
दायित्वों को ओढ़े 
ख़ामोशी से
यंत्रवत सक्रिय
ये हाथ और पैर चलते रहे .
मष्तिष्क और ह्रदय 
मेरी धरोहर थे ,
जो अपनी वेदनाओं से
कोरे कागजों को रंगते रहे.
ये ही मेरी शक्ति है,
ज्वालामुखी -
जो धधक रही है,
विस्फोट न हो
सर्वनाश न हो
इसीलिए तो
ये छंद रच रहे  हैं.
तमाम आक्रोश, विवशताओं की देन 
आंसुओं का जहर 
कहीं मुझे ही न मार दे
बस इसी लिए 
ये जो सृजन  है
वह आक्रोश औ' विवशता को
नए पंख दे देता है
और मन 
हल्का  होकर
फिर उड़ान भरने के लगता है. 


शुक्रवार, 28 मई 2010

किसी की आँख का आँसू!


आँख से आँसू 
किसी के 
यूं ही नहीं झरते
दर्द को पीकर 
जुबान जब थाम लेते हैं 
सिसकियों के खौफ से
गम को दबाते ही
किसी के आँख से 
रुकने का नहीं नाम लेते हैं.
पार्क की एकांत बेंच पर
सुनसान सा कोना पकड़कर
चुपचाप पी गरल 
अपमान औ' तिरस्कार का
इस तरह से दिल हलकान होते हैं
नजर पड़े उनपर
कभी
घर की सीमा में
बंद करो नाटक
सुनने से भयभीत होते हैं.
अपनों के दिए 
दर्द की कसक
किस पर बयां करें
इस तरह से आँसू 
गिराकर दिल थाम लेते हैं.
याद कर उनकी अठखेलियाँ
कभी लव मुस्करा जाते हैं
तैर जाती है हंसी
पर अगले ही पल 
याद उस पल की
उनसे हंसी छीन लेते  हैं.
एक बहस से बेहतर है
कुछ पल बिता लें
साथ उनके
बाँट लें थोड़ा सा गम
प्यार से डूबे स्वर
उस गम से उबार लेते हैं.

बुधवार, 26 मई 2010

ये दर्द बयां करती है !



ऐसा नहीं कि 
जो ये कलम चल रही है,
हर दिशा में 
आग उगल रही है.
नाहक  ही बन्दूक सी
हर समय गरजा करती है.
कभी इसके दर्द को समझो,
ये सच है
कि ये लिखती यथार्थ है
मगर 
ये कोई न कोई दर्द बयां करती है.
चाहे वे शब्द
स्याही की जगह
आंसुओं से सने हों
शब्दों ने दर्द को
जीकर ही
कराह अपनी जो सुनाई
तभी तो वह विष वमन करती  है.
सुनती है कितनी जबानों से
दर्द से सराबोर दास्तानें 
उन्हीं में डूब कर
दर्द के अहसास को 
पहले जीती औ'
फिर दास्तान  बयां करती है.

मंगलवार, 25 मई 2010

हाशिये में दर्द !


दर्द को हाशिये में डालो,
मुस्कानों के 
सिलसिले से 
एक इबारत नयी लिखो,
उनके बीच बस
बिंदियाँ दर्दों की हों.
गर मुस्कानें  कम लगें
खोज लो  बचपन में
निर्दोष, खामोश 
जिंदगियों में  और
उनको बाँट लो
जग के सारे गम
उनके सामने 
बहुत छोटे पड़ जायेंगे.
मुस्कानों की चमक  में
गम कहीं दब जायेंगे
खिले चेहरों पर
गर
कहीं संजीदगी आती भी है
मुस्कराओ और मुस्करा कर
सारे ग़मों को बाँट लो. 
आंसुओं  से  भरे  चेहरे 
मुसकान  से  भर  जायेंगे . 

शनिवार, 22 मई 2010

पत्थर बना दिया !



सोचती हूँ अब भी 
न जाने क्यों,
वक़्त के थपेड़ों ने मुझे
पत्थर बना दिया.
थी तो मैं 
समंदर के किनारे की रेत
जिसने रखे कदम 
दिल में समा लिया.
प्यार के अहसास से
इतना सुख दिया
हर आने वाले को
अपना बना लिया.
अब मगर 
बात कुछ और है
बोले बहुत बोल 
ज़माने ने इस तरह
पत्थरों पर भी
कभी दूब उगा करती है.
उन्हें पता कहाँ है
कि पत्थरों के गर्भ में
नदियाँ भी पला करती हैं.
जमीं पर जो है
नदियाँ 
पहाड़ों से
जमी पर गिरा करती हैं.
कोई  बताये उनको
लोग बदल गए हैं
फिर भी ये निर्जीव
पत्थर
इंसान से बेहतर हैं
ये तो नहीं कि
सीने से लगा कर
खंजर चुभा दिया.
देखा किसी तृषित को
पत्थर ने सीना तोड़ कर
ममता औ' स्नेह का 
अविरल सोता बहा दिया.
फर्क  नहीं उसको
चाहे कोई उठाकर
मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे 
की दीवार पर रखे
या फिर
किसी की कब्र पर सजा दिया.

गुरुवार, 20 मई 2010

प्यासी धरती - प्यासे मन!



बंजर धरती 
दरकन माटी की,
दरका देती है
दिल सैकड़ों के.
पर क्या करते?
गर आंसुओं से 
बुझती प्यास 
हर आँख
इतना रोती औ'
नीर बहा देती, 
प्यास से पपड़ाये 
होंठों की प्यास
शीतल कर देती.
मन में उमड़ते 
विचारों के बादल 
इतना बरसाती
आकाश में उठी निगाहों को 
आशा से भर देती,
धरती की ज्वाला 
निर्मल जल से शांत कर देती.
मन के खिलते पुष्पों की
एक बगिया 
इस धरती के आँचल को 
चुपचाप रंगीनी से भर देती. 
ये धरती फिर लहलहाए 
ऐसा कुछ कर देती.
सूखी सूखी सी आँखों में
जीवन के रंग भर देती.

गुरुवार, 6 मई 2010

नाम रोशन कर्मों से!

लोग कहते हैं ,
जमाना बदल गया है.
बेटे और बेटियां एक समान,
पर फर्क
दिख जाता है,
कुलदीपक होना जरूरी है.
वंश  का नाम चलेगा.
लड़कियाँ थोड़े ही चलाती हैं.
हम क्यों भूल जाते हैं
गर लड़के कुलदीपक है,
तो लड़कियाँ कुल ज्योति क्यों नहीं? 
नाम रोशन बेटे या बेटियां नहीं,
अपने  कर्मों से होता है.
सम्मान भी अपने कर्मों से मिलता है.
बेटे या बेटियां 
कितनी पीढ़ियों तक
आप का नाम चला लेंगे?
आप ही बतलाइये
आपके प्र-प्रपितामह क्या थे?
उनके नाम और उनके पिता का नाम
अपने गाँव और देश में
पूछ कर आइये
कोई नहीं बता पायेगा.
फिर वंश का क्या अर्थ?
गाँधी-नेहरु की बात लीजिये
गर इंदिरा न भी होती
तो नेहरु वही थे,
गाँधी तो
अपनी संतति से नहीं
अपनी पहचान खुद बने,
सिर्फ एक नहीं
सम्पूर्ण विश्व पटल पर
एक प्रतीक बन गए.
फिर 
हम क्यों सोचते हैं?
नाम कोई और रोशन करे,
खुद ही क्यों नहीं?
करें कुछ कर्म ऐसे
रच जाएँ कुछ ऐसा
जो सदियों तक साक्षी रहे
हमारे कर्मों के,
नाम तो सदा रहेगा.
कोई पढ़ेगा या सुनेगा तो कहेगा ,
 ये कोई सज्जन व्यक्ति थे.
ये मील का पत्थर 
कोई मिटा नहीं पायेगा.
कुल दीपक या कुल ज्योति 
इसके लिए जिम्मेदार नहीं?
हमारे कर्म ही हमारे जिम्मेदार हैं.
नाम रोशन करे या फिर कालिख पोत दें.